Kuch kahna chahta hu..

कुछ कहना चाहता हूँ

Posted by Pushkar

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कुछ कहना चाहता हूँ


बहोत अजीज़ है वो लोग
जो तुम्हें दर्द देते हैं ,
वरना इस ज़माने में
किताबें ज़िन्दगी जीने का
हुनर नहीं सिखाती
सुनो , कुछ कहना चाहता हूँ
मैं इस हवा में बेहना चाहता हूँ,
ए खुदा मुझे रोकना मत
मैं दर्द इश्क़ का सहना चाहता हूँ !

अब अश्क़ों की कोई जगह नहीं
जनाब इश्क़ सा हमने करा ही नहीं ,
ये फिजाएं न जाने किसका पता देती हैं
जो मैं ढूंढता हूँ खुद में तुझसा कोई ?

इंतेज़ार मैंने बेहिसाब किया है
लोग कहते हैं तूने इश्क़ शरेआम किया है ,
जो तू रुखसत हुई तो यादें भी रुखसत कर देती
इस शायर को बदनामियात से बचा लेती ।


कि अब ये चलती सांसें मेरी मुझसे पूछ रही है,
क्या ख़ता थी मेरी मुझसे पूछ पूछ रही हैं
अब रोज़ अकेला जब मैं तन्हा होता हूँ,
किसी को पता नहीं चलता
पीकर कर मैं अंदर ही अंदर रोता हूँ ..!

कि फ़ितरत इश्क़ की यही रहती है,
फिर दिल में बेचैनी सी रहती है,
दुनिया की फिर किसको खबर
जनाब आपकी जिंदगी आम नहीं रहती है ।

सही कहता है ज़माना कि प्यार
इंसान को पागल कर देता है ,
पर जहाँ सब दिमाग नहीं चलते
वहाँ प्यार मसले हल कर देता है ।

हाँ अब तू नहीं पर
कलम तो है मेरे पास एहसास लिखने को
ज्यादा कुछ तो बचा नही मुझमें
पर बहोत कुछ है सीखने को !

चल कोई मज़ाक ही कर ले
मुझसे ए ज़िन्दगी ,
मैं फिर से हँसना चाहता हूँ
सुनो, कोई बात है दिल मैं
जो मैं कहना चाहता हूँ ,
मैं दर्द इश्क़ का सहना चाहता हूँ !
मैं दर्द इश्क़ का सहना चाहता हूँ...!



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