Wajah puchti ho

broken

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वजह पूछती हो

उसने कहा शायरी क्यों लिखते हो
मैंने कहा पहले दर्द दिया ,
अब वजह पूछती हो ,
ज़ख्म ताज़े करके मेरे
अब तुम लिखने की वजह पूछती हो ।

देख लिया सब ज़िन्दगी में अब
मुसाफिरों को कोई सहारा नहीं
गुज़र गया जो गुज़रना था ,
ये वक़्त अब हमारा नहीं ।

भटकी कश्तियों का कोई किनारा
हम भी तेरे बिन बेसहारा नहीं
छोड़ अब पहोंच ही जाना है
मंज़िल पे कोई साथ हो
तो भी और ना हो तो भी ,
कि तुम अभी भी दूर जाने की
वजह पूछती हो
बर्बाद कर ज़िन्दगी हमारी
अब तुम लिखने की वजह पूछती हो ।

हाँ कर ली जो गलती हमने
कि हर किसी पे यकीन करना
अच्छी आदत नहीं,
अब सोचने पे तू मजबूर है
तु भी कि ये मेरी चुप्पी है या
बगावत की निशानी,
छुपी है लबों पे मेरे
कोई बेदर्द सी कहानी,
अब बातों में , इन रातों में
बेवजह ये सवाल पूछती हो
खेल के मेरी ज़िंदगी से
मेरे लिखने की वजह पूछती हो ।

जो साथ हैं बस उनकी ही बात है
जो छोड़ गया उसके लिए
ना कोई अब जज़बात है,
कि वार खंजरों के सामने
से हों तो अच्छे लगते हैं
जो साथ है मेरे
मुझे पहचानता वही
लिखते वक्त शायरी
तू साहिल किसी की मानता नहीं ।

ज़ख्मों का गुलदस्ता दे कर
मुझसे शरेआम पूछती हो
करके खफ़ा तुम साहिल को
लिखने की वजह पूछती हो
जवाब पता है तुम्हें फिर
ये सवाल खामखा पुछती हो
अब तुम मुझसे मेरे
लिखने की वजह पूछती हो .....।✍✍

Written by:Pushkar

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